ललित नारायण मिश्र कॉलेज ऑफ बिजनेस मैनेजमेन्ट, मुजफ्फरपुर में राष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (ICSSR) द्वारा संपोषित भारतीय ज्ञान परंपरा के आलोक में विशाल भारत की संकल्पना को नई दिशा देने के उद्देश्य से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन हुआ
मुजफ्फरपुर : राष्ट्रीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद् (आई.सी.एस.एस.आर.) द्वारा सम्पोषित Role and Relevance of Bhartiya Gyan Parampara in Vishal Bharat (विशाल भारत में भारतीय ज्ञान परंपरा की भूमिका एवं प्रासंगिकता) विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार का समापन ललित नारायण मिश्र कॉलेज ऑफ बिजनेस मैनेजमेन्ट, मुजफ्फरपुर में किया गया आज के तकनीकी सत्र की शुरूआत डा. पी. ओमकार (असिसटेन्ट प्रोफेसर शिक्षा विभाग, महात्मा गाँधी केन्द्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी) द्वारा किया गया
उनका कहना था कि हमारे सामने चुनौती ये है कि विशाल भारत जो भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं भाषा में विशाल है उसके पास डेमोग्राफिक डिविडेन्ड है और ये कुछ दशक तक जारी रहेगा
पूरा विश्व हमारे तरफ देख रहा है क्योंकि हमारे पास युवा संख्या ज्यादा है रूस, चीन, अमेरिका इत्यादि के पास जनसंख्या डिविडेन्ड नहीं है हम इस संख्या को कैसे दिशा दे रहे हैं, ये समस्या है हमें यह चिन्तन करने की जरूरत है कि हम लोगों में से कितने सच में पढ़ाई करने के लिए पढ़ रहे हैं, या सच में नौकरी लेने के लिए पढ़ना चाहते हैं हमारे देश में ऐसा कोई भी कोर्स नहीं, जिसे सही ढंग से पढ़ ले तो उसमें अपार मौका नहीं है लेकिन हम वह नहीं पढ़ रहे हैं जो मौका उपलब्ध करायेगा जैसे भाषा की नींव एन.ई.पी. 2020, इन्डिका अध्ययन की बात कर रहा है विद्यार्थी के मन में प्रश्न है कि क्या हम भारतीयता ला पायेंगे जब हम भारतीय ज्ञान परंपरा का अध्ययन करेंगे तो हम सफल हो पायेंगे
अध्ययन सामग्री एवं पाठ्यक्रम किस तरह बनाया जाए कि अध्यापन संबंधी चुनौतियाँ कम से कम हो सके आज छात्र से ज्यादा शिक्षक के पास चुनौतियों है बदलते परिपेक्ष्य में जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है क्या उसे भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ पाएंगे पाठ्य सामग्री ऐसी होनी चाहिए कि अपने स्थानीय भाषा में हम विषय को समझ पायें वैश्विक स्तर पर एक विशेष भाषा को वैश्विक रैंकिंग के बोझ को समझना होगा और उसे हटाना होगा विद्यार्थी समझ नहीं पा रहे कि आखिर इस बोझ को कैसे उतारा जाए आर्थिक रफ्तार यदि स्थानीय जिलों में देखी जा रही है तो अन्य जिलों में कैसे बढ़ायी जाए इसके लिए पाठ्य सामग्री एवं पाठ्यक्रम पर विशेष र्काय करने की जरूरत है क्योंकि ये दोनों अध्ययन और अध्यापन की आत्मा है
डा. नीलिमा झा, (प्राचार्या, रामसकल सिंह महाविद्यालय, सीतामढ़ी) ने कहा कि भारतीय परंपरा के लोकप्रिय कृति कालिदास के अभिज्ञान शकुन्तलम के माध्यम से छात्रों को सामाजिक शिष्टाचार पर विकसित होना चाहिए संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर डा. नीरज कुमार ने अपने प्रपत्र के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा की सार्वभौमिकता को कॉरपोरेट कम्पीटेन्ट डेवलपमेंट में तैत्तिरीयोपनिषद् के पंचकोष के सिद्धांत को सबल बताया और सी.एल.एस. एवं सी.आर.बी. मॉडल को मिश्रित कर इसे आधुनिक प्रबंधन के मैसलो सिद्धांत के मूल स्रोत के तौर पर स्थापित किया
द्वितीय सत्र का आरंभ प्रो. रंजन कुमार, बेहेरा (एसोसिएट प्रोफेसर, एलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग विभाग, आई.आई.टी., पटना) के द्वारा किया गया उन्होंने अपने प्रपत्र के माध्यम से सार्वभौमिक कल्याण, तनाव प्रतिक्रिया प्रणाली एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के द्वारा अपनाये गये रोजमर्रा के अभ्यास को विस्तृत रूप से वास्तविक उदाहरण देते हुए प्रस्तुत किया
अन्य शोधार्थियों में श्रीमती कात्याणी शंकर ने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि आज भी अपने व्यक्तिगत लाभ को त्यागते हुए नियोक्ता एवं कर्मचारी के बीच में संस्था के अंतर्गत नैतिक वातावरण तैयार किया जा सकता है