कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अधिकारी, महिला कर्मचारी एवं जीविका समूह की प्रतिनिधियां उपस्थित रहीं
कार्यक्रम का उद्घाटन जिलाधिकारी सुब्रत कुमार सेन द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया अपने संबोधन में जिलाधिकारी ने कहा कि बदलते सामाजिक परिवेश, बढ़ती महिला कार्यभागीदारी तथा कार्यक्षेत्रों के निरंतर विस्तार के साथ इस कानून की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ गई है आज महिलाएं केवल पारंपरिक कार्यालयों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कारखानों, विद्यालयों, महाविद्यालयों, अस्पतालों, निजी प्रतिष्ठानों, गैर-सरकारी संगठनों तथा डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसे विविध कार्यक्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं ऐसे में उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना प्रशासन और संस्थानों की प्राथमिक जिम्मेदारी है
जिलाधिकारी ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को समानता का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण प्रदान करता है कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार का लैंगिक भेदभाव या यौन उत्पीड़न न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि यह संविधान की मूल भावना के भी विपरीत है उन्होंने स्पष्ट कहा कि सुरक्षित कार्यस्थल उपलब्ध कराना प्रत्येक संस्था की कानूनी ही नहीं, नैतिक जिम्मेदारी भी है
महिला सशक्तिकरण के व्यापक परिप्रेक्ष्य में जिलाधिकारी ने बताया कि जिले में लगभग 9 लाख दीदियां स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से जीविका से जुड़ी हुई हैं इन समूहों ने महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है
उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि पूरे बिहार में सर्वप्रथम मुजफ्फरपुर जिले में हरी सभा कल्याणी चौक पर कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास की सुविधा उपलब्ध कराई गई है, जहां सुरक्षित, सम्मानित एवं गरिमापूर्ण वातावरण में महिलाओं को आवास की सुविधा मिल रही है यह पहल कार्यरत महिलाओं को सहयोग और सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है
कार्यशाला में आईसीडीएस की परियोजना निदेशक श्रीमती अंकिता कश्यप ने अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों की विस्तार से जानकारी दी उन्होंने बताया कि अधिनियम के अंतर्गत किसी भी प्रकार का अवांछित शारीरिक, मौखिक या गैर-मौखिक व्यवहार, अश्लील टिप्पणी, अनुचित स्पर्श, धमकी, अपमानजनक संकेत, आपत्तिजनक ईमेल, सोशल मीडिया या अन्य डिजिटल माध्यम से की गई अनुचित हरकत भी यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आती है उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कानून केवल प्रत्यक्ष व्यवहार तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल और आभासी माध्यमों पर होने वाले उत्पीड़न को भी समान गंभीरता से देखता है
उन्होंने बताया कि यदि किसी संस्था में 10 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं, तो वहां आंतरिक शिकायत समिति का गठन अनिवार्य है इस समिति में एक वरिष्ठ महिला कर्मचारी को अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए तथा बाहरी सदस्य के रूप में किसी सामाजिक कार्यकर्ता या विधिक विशेषज्ञ को शामिल करना आवश्यक है छोटे संस्थानों के लिए जिला स्तर पर स्थानीय शिकायत समिति की व्यवस्था की गई है, ताकि असंगठित क्षेत्र की महिलाएं भी न्याय प्राप्त कर सकें
श्रीमती कश्यप ने शिकायत प्रक्रिया की जानकारी देते हुए कहा कि शिकायत दर्ज होने के पश्चात निर्धारित समयसीमा के भीतर जांच पूरी करना अनिवार्य है जांच प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और संवेदनशील होनी चाहिए पीड़िता की गोपनीयता की रक्षा करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और किसी भी स्तर पर उसकी पहचान उजागर करना दंडनीय है अधिनियम में यह प्रावधान भी है कि जांच के दौरान पीड़िता को कार्यस्थल परिवर्तन, विशेष अवकाश या अन्य अंतरिम राहत प्रदान की जा सकती है, ताकि वह बिना किसी दबाव के न्यायिक प्रक्रिया में भाग ले सके
दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई, आर्थिक दंड या सेवा समाप्ति तक की अनुशंसा की जा सकती है